भारतीय शेयर बाजार में तेजी आने वाली है?


गौतम त्रिवेदी
अमेरिका में महंगाई लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डाल रही है। चाहे एक कप कॉफी पीनी हो, ऊबर से कहीं जाना हो, ग्रॉसरी की खरीदारी करनी हो या रेस्टोरेंट में खाना हो- हर जगह यह असर दिख रहा है। काम करने वाले लोगों की भी वहां भारी कमी हो गई है। अप्रैल में अमेरिका में 13,500 लोगों ने एविएशन इंडस्ट्री की नौकरी छोड़ दी। इस इंडस्ट्री में काम करने वालों की कमी बहुत ज्यादा है और मांग अधिक। इसलिए पिछले हफ्ते डेल्टा एयरलाइंस किसी भी पैसेंजर को 10 हजार डॉलर देने को तैयार थी, जो मिशिगन से मिनेसोटा वाली फ्लाइट में अपनी सीट छोड़ने को तैयार हो। होटल इंडस्ट्री में भी लेबर शॉर्टेज बहुत ज्यादा है। मैं न्यूयॉर्क के जिस होटल में रह रहा हूं, उसमें काम करने वाले हाउसकीपर को पहले एक घंटे के काम के लिए 18 डॉलर मिलते थे, अभी 30 डॉलर मिल रहे हैं।

महंगाई का मर्ज
अमेरिका में अधिकतर लोग अभी भी हफ्ते में 2-3 दिन घर से काम कर रहे हैं, लेकिन जिंदगी सामान्य ढर्रे पर लौट रही है। इन्हीं हालात में मैंने अमेरिकी निवेशकों और फाइनैंस इंडस्ट्री में काम करने वालों से मुलाकात की। उनसे मुझे जो पता चला, वह मैं यहां बता रहा हूं:

  • महंगाई अमेरिका में अभी सबसे बड़ी प्रॉब्लम है। फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में जो 1.25 फीसदी की बढ़ोतरी की है, उससे अभी तक इसमें कमी नहीं आई है
  • ब्रिक्स देशों में ब्राजील और चीन में निवेशकों की दिलचस्पी बहुत कम है और रूस में पैसा लगाना मुमकिन नहीं। इसलिए भारतीय बाजार विदेशी निवेशकों को कुछ बेहतर लग रहा है, लेकिन अभी वे इमर्जिंग मार्केट्स में पैसा नहीं लगाना चाहते।
  • अमेरिकी निवेशकों को चीन में काफी नुकसान हुआ है। खासतौर पर टेक्नॉलजी सेक्टर की कंपनियों में। अधिकतर फंड चीन से मायूस हैं, लेकिन वे यह भी मानते हैं कि चीनी शेयर बाजार सस्ता हो गया है।
  • हमारी बातचीत में एक सवाल यह भी उठा कि सभी इमर्जिंग मार्केट्स को एक ही पलड़े में क्यों तौला जाता है? आखिर, मेक्सिको को जो दिक्कत हो रही है, वह भारत की परेशानी नहीं है। लेकिन जब ग्लोबल फंड इमर्जिंग मार्केट्स से पैसा निकालने लगते हैं तो वे सभी देशों को एक ही पलड़े में रखते हैं।

फोटोः BCCL

इमर्जिंग मार्केट्स का हाल
इन हालात में शेयर बाजार का भविष्य क्या दिख रहा है? अमेरिका में S&P 500 का इस साल के पहले 6 महीने में प्रदर्शन 1970 के बाद सबसे खराब रहा है। इस बीच इंडेक्स में 20 फीसदी की गिरावट आई है, जिससे निवेशकों को 8 लाख करोड़ डॉलर का नुकसान हुआ है। अगर हिस्ट्री देखें तो किसी भी साल जब पहले 6 महीनों में S&P 500 में 15 फीसदी या अधिक गिरावट आई है तो आखिर के 6 महीनों में उसमें 24 फीसदी की उछाल आई। वैसे, इस साल ऐसे रिटर्न की उम्मीद करना मुनासिब नहीं होगा।

चीन को छोड़ दें तो जनवरी 2021 के बाद विदेशी निवेशकों (FPI) ने इमर्जिंग मार्केट्स से 111 अरब डॉलर निकाले हैं, जबकि 2007-08 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान उन्होंने इन देशों से 93 अरब डॉलर निकाले थे। भारत, दक्षिण कोरिया और ताइवान में विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बीच इस साल बाजार कुछ मजबूत रहा तो उसकी वजह घरेलू निवेशक हैं। इन तीन देशों में घरेलू निवेशकों ने 2022 में अब तक 51 अरब डॉलर लगाए हैं। दूसरी ओर, ताइवान के बाद इस साल इन निवेशकों ने सबसे अधिक बिकवाली भारत में की है।

पिछले साल अक्टूबर में भारतीय शेयर बाजार ने नया शिखर छुआ था। उसके बाद से यह लगातार फिसला है। इस बीच, विदेशी निवेशकों ने यहां से 40 अरब डॉलर से अधिक निकाले हैं। वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान उन्होंने 15 अरब डॉलर की बिकवाली भारत में की थी।

अमेरिका में महंगाई पर काबू पाने के लिए फेडरल रिजर्व से जो भी बन पड़ता है, वह करेगा। इसका समूची दुनिया पर असर पड़ना तय है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कारोबार की मुद्रा डॉलर है। इसके असर से भारत सहित इमर्जिंग मार्केट्स के दूसरे देश भी नहीं बचेंगे। इसलिए रिजर्व बैंक को भी फेडरल रिजर्व की तर्ज पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी करनी होगी। अगर भारत में कर्ज महंगा नहीं होगा तो रुपया और कमजोर पड़ेगा। अभी तक इस साल डॉलर की तुलना में रुपया 6.25 फीसदी टूटा है। अगर ऐसा हुआ तो विदेश से आने वाली चीजों की कीमत देश में और बढ़ेगी। वहीं, आरबीआई के ब्याज दरें बढ़ाने के दो अहम असर होंगेः

  • कंपनियों और आम लोगों के लिए कर्ज महंगा होगा।
  • फिक्स्ड इनकम प्रॉडक्ट्स की तुलना में शेयर बाजार का आकर्षण घटेगा।

भारत पर भरोसा
यह भी याद रखना चाहिए कि भारत एशिया का सबसे महंगा शेयर बाजार है। साल 2023 के अनुमानित मुनाफे के हिसाब से निफ्टी 18.3 के प्राइस टु अर्निंग रेश्यो पर ट्रेड कर रहा है। दूसरी ओर, जापान को छोड़ दें तो एशियाई बाजारों में चीन के लिए यह 11 और अमेरिका के लिए 15.8 है। लेकिन अगले साल भारत में कंपनियों के मुनाफे में 14-15 फीसदी की सबसे अधिक तेजी आने वाली है, जबकि दूसरे इमर्जिंग मार्केट्स के लिए यह 10 फीसदी है।

निफ्टी 50 में रुपये में 10.5 फीसदी और डॉलर में 16 फीसदी की गिरावट आई है। वहीं, इस इंडेक्स में शामिल कई शेयरों में इससे कहीं ज्यादा फिसलन दिखी है।

  • BSE 500 में 148 शेयर अपने 52 हफ्ते के पीक से 40 फीसदी या उससे अधिक गिर चुके हैं।
  • 370 शेयरों में 52 हफ्ते के शिखर से 20 फीसदी या उससे अधिक की गिरावट आई है।
  • इसलिए BSE 500 के तीन चौथाई शेयर मंदी की गिरफ्त में हैं।

कहने का मतलब यह है कि भारतीय शेयर बाजार में काफी करेक्शन पहले ही हो चुका है।

(लेखक नेपियन कैपिटल के मैनेजिंग पार्टनर हैं)

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं





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