‘मुझे शुगर है…’, 10 में से 1 भारतीय को डायबिटीज, कैसे डालती है बचत पर डाका?


नई दिल्‍ली: ‘मेरी चाय में चीनी नहीं डालना, मुझे शुगर है…’ यह सुनना आम हो गया है। इसमें ताज्‍जुब की बात भी नहीं है। देश में 10 में से 1 व्‍यक्‍त‍ि को डायबिटीज (Diabetes in India) है। देश में यह बीमारी किसी महामारी से कम नहीं है। दुनिया की कुल डायबिटिक आबादी (Diabitic Population) का करीब 17 फीसदी भारत में रहती है। लाइफस्‍टाइल से जुड़ी यह बीमारी जब तक न छुए तब तक ही अच्‍छा है। कारण कि सेहत के साथ यह आपकी बचत पर भी डाका डालती है। एक अनुमान के मुताबिक, डायबिटीज को मेनटेन रखने का खर्च ही सालाना करीब 11 हजार रुपये से 25 हजार रुपये तक बैठता है। इसमें दवाओं, इंसुलिन, डॉक्‍टर और बार-बार ब्‍लडचेक-अप का खर्च शामिल है। इसके और भी नुकसान हैं। इसके लिए इंश्‍योरेंस प्रीमियम (Insurance Premium) का उदाहरण ले सकते हैं। जिस लेवल की डायबिटीज होती है, बीमा कंपनियां उसी हिसाब से प्रीमियम तय करती हैं। कुछ मामलों में तो पॉलिसी देने से ही इनकार कर दिया जाता है।

भारत दुनिया में डायबिटीज के रोगियों की राजधानी बन गया है। दुनिया की करीब 17 फीसदी डायबिटिक आबादी भारत में रहती है। इस बीमारी को कंट्रोल में रखने पर करीब 11,000 रुपये से 25,000 रुपये तक का खर्च आता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस शख्‍स का लाइफस्‍टाइल कैसा है और डायबिटीज का लेवल क्‍या है। डायबिटीज को मेनटेन करने की इस कॉस्‍ट में दवा, इंसुलिन, बार-बार ब्‍लड चेक-अप और डॉक्टर से अपॉइंटमेंट का खर्च शामिल है। यह तो सामने दिखता है। जो परोक्ष खर्च है वह तो इसमें शामिल ही नहीं है। इस चीज को थोड़ा और समझते हैं।

डायबिटीज की बीमारी शरीर के कई अंगों पर असर डालती है। यह बीमारी किडनी और लीवर को प्रभावित कर सकती है। इससे दिल का दौरा पड़ने का जोखिम बढ़ जाता है। पहले से ही जिन लोगों को समस्‍याएं हैं, यह उनकी दुश्‍वारियों को बढ़ाने का काम करती है।

एक हो जाए श‍िकार तो पर‍िवार की इनकम कैसे होती है प्रभावित?
एक अध्‍ययन के अनुसार, भारत में डायबिटीज के कुल रोगियों में से एक तिहाई से ज्‍यादा हर महीने 20,000 रुपये से कम कमाते हैं। एक कम आय वाला परिवार 1 वयस्क डायबिटिक के ट्रीटमेंट पर अपनी इनकम का 20 फीसदी तक खर्च कर सकता है। अगर परिवार में ऐसे एक से ज्‍यादा लोग हों तो खर्च का अंदाजा लगा सकते हैं। बेशक, सरकारी अस्पतालों में डायबिटीज की दवाएं मिलती हैं। लेकिन, उन पर हमेशा भरोसा नहीं किया जा सकता है। अक्सर आपको डिस्‍पेंसरी में दवाएं मिलती ही नहीं हैं या होने पर भी रिश्वत देने के लिए कहा जा सकता है।

इस बात पर तो जाता ही नहीं लोगों का ध्‍यान
सेहतमंद होने के बजाय डायबिटीज के नुकसान को इंश्‍योरेंस प्रीमियम के साथ जोड़कर देखा जा सकता है। डायबिटीज और हाइपरटेंशन जैसे लाइफस्‍टाइल रोगों का इंश्‍योरेंस प्रीमियम पर बड़ा असर पड़ता है। उदाहरण के लिए टाइप-2 डायबिटीज को लेते हैं। किसी स्‍वस्‍थ व्‍यक्ति के मुकाबले डायबिटीज वाले व्‍यक्ति से इंश्‍योरेंस कंपनियां 30-40 फीसदी ज्‍यादा प्रीमियम देने को कह सकती हैं। अगर यह टाइप-1 है तो बीमा कंपनी पॉलिसी देने से ही मना कर सकती है। अगर वह दे भी देती है तो 3 साल का वेटिंग पीरियड रख सकती है। इस अवधि के दौरान कंपनी डायबिटीज और इससे होने वाली समस्‍याओं को कवर नहीं करती है।

फिर क्‍या करना चाहिए?
सच तो यह है कि इसके लिए ज्‍यादा कुछ नहीं किया जा सकता है। डायबिटिक-स्‍पेसिफिक प्‍लान खरीदने पर वेटिंग पीरियड से निजात मिल सकती है। हालांकि, ऐसी पॉलिसियों का खर्च बहुत ज्‍यादा होता है। लिहाजा, ज्‍यादातर लोग शायद इन्‍हें नहीं खरीदें। ऐसे में सबसे अच्‍छा यह है कि कोई तब पॉलिसी खरीद ले जब वह स्‍वस्‍थ हो। कारण है पॉलिसी के अमल में आ जाने के बाद अगर कोई लाइफस्‍टाइल डिजीज हो जाती है तो बीमा कंपनी दोबारा नई शर्तों के साथ कॉन्‍ट्रैक्‍ट नहीं करेगी। इसका मतलब यह हुआ कि पॉलिसी ले लेने के बाद अगर बीच में डायबिटीज हो जाती है तो बीमा कंपनी ज्‍यादा प्रीमियम का भुगतान करने के लिए दबाव नहीं डाल सकती है।



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