Arun Jaitley Death Anniversary: देश की आर्थिक एकता के ‘सरदार पटेल’ थे अरुण जेटली, जानिए किसने पढ़ाया था जीएसटी का ककहरा


नई दिल्ली: आज देश के पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली की तीसरी पुण्यतिथि (Arun Jaitley Death Anniversary) है। वह मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में वित्त मंत्री बने थे। उनके कार्यकाल में देश में जीएसटी (GST) और नोटबंदी (demonetisation) जैसे चर्चित फैसले लिए गए। जीएसटी के लिए राज्यों के बीच आम सहमति बनाने का श्रेय जेटली को ही दिया जाता है। जीएसटी की पहल यूपीए सरकार के दौरान हुई थी लेकिन भारत जैसे विशाल देश में एक टैक्स व्यवस्था लागू करना आसान नहीं था। यूपीए सरकार के दौरान पहले प्रणव मुखर्जी और फिर पी चिदंबरम ने इसके लिए प्रयास किया लेकिन बात आगे नहीं बढ़ पाई। मगर जेटली ने अपने चातुर्य और कौशल का इस्तेमाल करते हुए राज्यों को इसके लिए मनाया और देश में आजादी के बाद सबसे बड़े टैक्स रिफॉर्म का रास्ता साफ किया।

बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने 2019 में जेटली के निधन के बाद एक लेख लिखा था। इसमे उन्होंने कहा था कि जेटली आधुनिक भारत में सबसे बड़े consensus builder थे। देश को एकता के सूत्र में पिरोने के लिए जो काम सरदार पटेल ने किया था, वही काम अरुण जेटली ने देश की इकॉनमी के लिए किया। उन्होंने देश को आर्थिक एकता के सूत्र में पिरोने का काम किया। जीएसटी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा जीएसटी कंपनसेशन का था। जेटली ने यह सुनिश्चित किया कि राज्यों को स्टेट फाइनेंस मिनिस्टरर्स की एम्पावर्ड कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक मुआवजा दिया जाएगा। इससे राज्यों और केंद्र के बीच भरोसे का वातावरण बना।

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मुआवजे पर रार
2017 में जीएसटी बिल पास हुआ और उसी साल एक जुलाई से इसे लागू कर दिया गया। जेटली ने साफ किया था कि राज्य और केंद्र का हिस्सा अलग-अलग होगा और समय के साथ कमियों को दूर किया जाएगा। जीएसटी कानून में यह तय किया गया था कि इसे लागू करने के बाद पहले पांच साल में राज्यों को राजस्व का जो भी नुकसान होगा, उसकी केंद्र सरकार भरपाई करेगी। आधार वर्ष 2015-16 को मानते हुए यह तय किया गया कि राज्यों के इस प्रोटेक्टेड रेवेन्यू में हर साल 14 फीसदी बढ़त को मानते हुए गणना की जाएगी। पांच साल के ट्रांजिशन पीरियड तक केंद्र सरकार महीने में दो बार राज्यों को मुआवजे की रकम देगी। कहा गया कि राज्यों को मिलने वाला सभी मुआवजा जीएसटी के कम्पेनसेशन फंड से दिया जाएगा।

पांच साल की अवधि इस साल 30 जून को खत्म हो गई। जब तक जेटली रहे तब तक इसका पालन किया गया। लेकिन जेटली के जाने के बाद इसमें समस्या आने लगी। मुआवजे के मुद्दे पर राज्यों और केंद्र के बीच तकरार बनी रही। राज्यों को मुआवजे की भरपाई के लिए जीएसटी के तहत ही एक कम्पेनसेशन सेस यानी मुआवजा उपकर लगाया जाता है। यह सेस तंबाकू और ऑटोमोबाइल जैसे गैर जरूरी और लग्जरी आइटम पर लगाया जाता है। इसी फंड से राज्यों के मुआवजे की भरपाई की जाती है। लेकिन लॉकडाउन में इस फंड में भी कुछ खास रकम नहीं आई जिसके बाद केंद्र सरकार के लिए राज्यों को मुआवजा देने में काफी मुश्किल आने लगी। केंद्र ने कह दिया था कि उसके पास राज्यों की हिस्सेदारी देने के लिए पैसे नहीं हैं।

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सर्वसम्मति पर जोर
जेटली के कार्यकाल के दौरान जीएसटी काउंसिल में सभी फैसले सर्वसम्मति ले लिए गए। कभी भी वोटिंग की नौबत नहीं आई। काउंसिल की पहली पांच-छह बैठक तो विवादित मुद्दों पर आम सहमति बनाने पर ही केंद्रित रही। केंद्र और राज्य दोनों सरकारें वस्तुओं पर अप्रत्यक्ष कर लगातीं थीं। राज्यों के पास कई कानून थे, जो उन्हें अलग-अलग बिंदुओं पर टैक्स लगाने का अधिकार देते थे। ऐसे में जीएसटी लागू करने की राह में बड़ी चुनौतियां थीं। सबसे पहली चुनौती थी राज्यों को सहमत करने की। राज्यों को लगता था कि जीएसटी लागू होने के बाद वे कर लगाने की अपनी स्वायत्तता खो देंगे। दूसरी सबसे बड़ी चुनौती थी संसद में इसको लेकर सहमति बनाने की। लेकिन यह जेटली को कौशल का नतीजा था कि वह इन चुनौतियां को पार करने में सफल रहे। लेकिन उनके जाने के बाद जीएसटी काउंसिल में पहली बार लॉटरी के मामले में वोटिंग की नौबत आई।

जीएसटी लागू होने पर टैक्स से जुड़े सभी 17 तरह के कानून एक में मिल गए। इस तरह देश में सिंगल टैक्सेसन की व्यवस्था लागू हो सकी। पहले 14.5 फीसदी वैट और 12.5 प्रतिशत एक्साइज देना पड़ता था। सारे टैक्स मिलाकर उपभोक्ताओं को 31 प्रतिशत टैक्स अदा करना पड़ता था। साथ ही कई रिटर्न दाखिल करने पड़ते थे। मगर जीएसटी ने इस पूरा सीन बदल दिया। जीएसटी में पांच फीसदी, 12 फीसदी और 18 फीसदी की तीन कैटगरीज हैं।

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किसने सिखाया था जीएसटी का ककहरा
जीएसटी लागू होने से पहले जेटली ने संसद में भाषण दिया था। इस दौरान उन्होंने जीएसटी के सफर के बारे में भी जानकारी दी थी। उन्होंने कहा था, ‘मुझे पहली शिक्षा असीम दासगुप्ता से मिली थी। इसके लिए मैं उनका आभार व्यक्त करता हूं।’ असीम दासगुप्ता राज्य पश्चिम बंगाल में बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार में वित्त मंत्री थे। जीएसटी को लेकर जब यूपीए सरकार ने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के प्रस्ताव को आगे बढ़ाया था तो असीम ने अहम जिम्मेदारी संभाली थी। वह जीएसटी काउंसिल के पहले अध्यक्ष भी रहे थे।

ट्रेडर्स को क्यों याद आते हैं जेटली
ट्रेडर्स जीएसटी के जटिलताओं को लेकर परेशान हैं। उनका कहना है कि अगर आज जेटली जीवित होते तो जीएसटी सिस्टम इतना जटिल नहीं होता। जेटली कारोबार को आसान बनाने के लिए समर्पित थे और जब तक वित्त मंत्री रहे तब तक जीएसटी के नियमों में लगातार आवश्यकतानुसार संशोधन होते रहे। ट्रेडर्स का कहना है कि जेटली ने जिस जीएसटी की परिकल्पना की थी, वह आज कहीं खो गया है। उसके स्थान पर जीएसटी एक बेहद, उलझी हुई और व्यापारियों को परेशान करने वाली कर प्रणाली बन गई है। जेटली लगातार व्यापारियों से सलाह-मशविरा करते थे लेकिन उनके जाने के बाद जीएसटी काउंसिल ने या किसी राज्य की सरकार ने व्यापारियों से कोई सलाह मशवरा नहीं किया है। जीएसटी में मनमाने तरीके से बदलाव किए जा रहे हैं।



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