DOLO-650 : बिक्री बढ़ाने के लिए दवा कंपनियां इस तरह डाॅक्टरों को देती हैं लालच, डोलो 650 विवाद के बाद उभरी समस्या


नई दिल्लीः पैरासिटामोल दवा डोलो के हाल ही में हुए विवाद के बाद दवा कंपनियां शक के घेरे में आ गई हैं। बिक्री बढ़ाने के लिए दवा कंपनियां क्या डाॅक्टरों को आकर्षक गिफ्ट्स और लालच देती हैं! इसपर सवाल उठ रहे हैं। बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में दावा किया गया है कि फार्मा कंपनी ने बुखार की दवा डोलो 650 (Dolo-650) मरीजों को देने के लिए देशभर में डॉक्टरों को करोड़ों रुपये बांटे गए हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से 7 दिन में जवाब मांगा है। डोलो 650 विवाद के बाद किस तरह दवा कंपनियों की मुश्किलें बढ़ी हैं, क्या दवा कंपनियां बिक्री बढ़ाने के लिए डाॅक्टरों को लालच देती हैं? आईए आपको बताते हैं –

जानिए क्या है डोलो 650 विवाद
डोलो 650 दवा काफी चर्चा में रही है। ये वहीं टैबलेट है जो कोविड के इलाज में बेहद कारगर बताई गई थी। ये दवा लगभग सभी डाॅक्टरों के पर्चे पर लिखी देखी जा सकती थी। डोलो 650 के मेकर्स पर आरोप लगे कि उन्होंने डाॅक्टरों को एक हजार करोड़ रुपये के गिफ्ट्स बांटे थे। माइक्रो लैब्स लिमिडेट (Micro Labs Ltd) नामक कंपनी इस दवा को बनाती है। इस आरोप के बाद इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने पिछले महीने कंपनी के 9 राज्यों में 36 परिसरों पर छापेमारी की थी। इस मामले में याचिकाकर्ता फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव एसोसिएशन ऑफ इंडिया है। सीबीडीटी की जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि कंपनी ने डॉक्टर्स को जमकर गिफ्ट्स बांटे हैं।

इस तरह हुआ खेल
याचिकाकर्ता ने पीठ को बताया था कि 500 एमजी तक की टैबलेट की कीमत सरकार द्वारा कंट्रोल्ड की जाती है। लेकिन इससे अधिक की टैबलेट की कीमत फार्मा कंपनी द्वारा निर्धारित की जा सकती है। डोलो 650 के मामले में यही हुआ है। कोरोना महामारी के दौरान डोलो 650 टैबलेट की खूब बिक्री हुई थी।

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क्या दवा कंपनियां डाॅक्टरों को देती हैं लालच
मिंट में छपी एक खबर के मुताबिक, कई मेडिकल प्रोफेशनल्स कहते हैं कि किसी भी तरह के फाइनेंशियल इनसेंटिव वित्तीय प्रोत्साहन उन्हें किसी कंपनी की दवा लिखने के लिए मजबूर नहीं कर सकते हैं। जबकि कुछ का कहना है कि फार्मा कंपनियों के मार्केट सेल्स एग्जीक्यूटिव प्राइवेट सेक्टर के डाॅक्टरों को ज्यादा अप्रोच करते हैं। उनके मुताबिक ये सेल्स एग्जीक्यूटिव कंपनी की नई दवा के बारे में बताने के लिए डाॅक्टरों के पास जाते हैं। वो डाॅक्टरों से कंपनी की नई दवा प्रेसक्राइब करने के लिए कहते हैं। इसके बदले वो डाॅक्टरों को पेन, राइटिंग पैड और किताबों के साथ कई बार महंगे गिफ्ट्स भी देते हैं।

दवा कंपनियां इस वजह से करती हैं मार्केटिंग
एक सरकारी डाॅक्टर के मुताबिक, बिना मार्केटिंग के कोई भी फार्मा कंपनी स्टैंड नहीं कर सकती है। ऐसे मामले कम ही होते हैं जिसमें किसी फार्मा कंपनी ने कोई दवा मार्केट में उतारी और उसकी डिमांड बढ़ जाए। इसके अलावा बाकी के मामलों में देखा जाए तो मेडिसिन को खरीदने का फैसला मरीज का नहीं होता बल्कि डाॅक्टर का होता है। क्योंकि डाॅक्टर की अपने पर्चे पर दवा का नाम लिखकर मरीज को देते हैं। यही एक चीज है जो फार्मा सेक्टर को मार्केटिंग इंडस्ट्री बनाती है।

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क्या अस्पतालों को भी दिया जाता है लालच
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक एक बड़े प्राइवेट हाॅस्पिटल के डाॅक्टर ने बताया कि कई मामलों में कुछ अस्पतालों को भी लालच दिया जाता है। ऐसे अस्पताल जिनकी देश के कई शहरों में ब्रांच हैं वो बल्क में दवाएं खरीदती हैं। ऐसे अस्पतालों को लालच ज्यादा दिया जाता है। ऐसे अस्पतालों में काम करने वाले डाॅक्टरों का अस्पताल के अंदर बिकने वाली दवा पर कोई कंट्रोल नहीं होता है। वहीं जो डाॅक्टर छोटे क्लीनिक चलाते हैं वो एक एरिया में कुछ लिमिटेड पेशेंट को ही देखते हैं। ऐसे डाॅक्टरों के पास कोई फार्मेसी भी नहीं होती है।

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इनकम टैक्स डिपार्टमेंट का कैसे बढ़ा शक
टैक्स अधिकारियों को कुछ मामलों में शक हुआ। इसके बाद आयकर कानून में एक नई धारा 194आर जोड़ दी गई है। अब एक वित्तीय वर्ष में अगर 20 हजार रुपये या उससे ज्यादा का बेनेफिट दिया जाता है तो उस पर 10 प्रतिशत टीडीएस कटेगा।



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