Freebies News: रेवड़ी क्‍यों, किसे और कितनी? सुलझ सकती है पहेली, पूर्व RBI गवर्नर सुब्‍बाराव से समझिए


नई दिल्‍ली: इन दिनों रेवड़‍ी (Freebies) पर राजनीति गरम है। राजनीतिक दल इसके लिए एक-दूसरे पर तोहमत लगा रहे हैं। इस पर अंकुश लगाने की तमाम कोशिशें नाकाम रही हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर डी सुब्‍बाराव (D Subbarao) ने इस बारे में हमारे सहयोगी अखबार टाइम्‍स ऑफ इंडिया (TOI) में एक लेख लिखा है। इसमें उन्‍होंने रेवड़ी कल्‍चर के पनपने के पीछे कारणों का जिक्र किया है। उन्‍होंने इस समस्‍या का सामाधान भी बताया है। उनके मुताबिक, इसके लिए लागत से कम दाम की चीजों और वस्‍तुओं को पहचानना होगा। राज्‍यों और सरकारों के लिए इस मद में सीमित बजट तय करने की जरूरत होगी। लेख में सुब्‍बाराव ने बताया है कि कैसे रेवड़ि‍यां वोट बंटोरने के लिए राजनीतिक हथकंडा बन गईं? क्‍यों कोई इसके खिलाफ बोलना नहीं चाहता? अर्थव्‍यवस्‍था पर रेवड़ी का असर कैसे पड़ता है? तमाम कोशिशों के बावजूद आखिर इस पर अंकुश लगाना क्‍यों मुश्किल है?

सुब्‍बाराव के अनुसार, रेवड़ी पर किसी बहस में इस बात को ध्‍यान में रखना होगा कि इसमें केंद्र और राज्‍य दोनों दोषी हैं। ऐसे में एक-दूसरे पर तोहमत सही नहीं है। इस बहस पर चर्चा करने के लिए ज्‍यादा ईमानदार और खुली सोच रखनी होगी। समझना होगा कि लोक लुभावन खर्च उधारी की रकम से पूरे किए जाते हैं। किसी भी उधारी को यह देखकर ही लिया जा सकता है कि उससे भविष्‍य में कमाई कैसी होगी। अगर ऐसा नहीं होता है तो वह कर्ज हमारे बच्‍चों के लिए बोझ बनेगा। एक अच्‍छे लोकतंत्र के लिए संस्‍थानों का मजबूत होना जरूरी है। ये सरकार की फिजूलखर्ची पर अंकुश लगाते हैं। सुब्‍बाराव ने कहा है कि दुर्भाग्‍य से वो अंकुश निष्‍प्रभावी हो गए हैं।

कहां-कहां से लग सकता था अंकुश
आरबीआई के पूर्व गवर्नर ने लिखा है कि पहला काम तो संसद से होना चाहिए। यहां विपक्ष की भूमिका अहम है। उनका काम सरकार के कदमों पर नजर रखना है। उन्‍हें सही जगह पर लाना है। लेकिन, वोट गंवाने के डर से विपक्ष बोलने की हिम्‍मत नहीं जुटाता है। सैद्धांतिक रूप से कैग का ऑडिट एक और दीवार है। यह सरकार के कर्ज पर खुलकर टिप्‍पणी कर सकता है। उसे किसी तरह का डर नहीं है। हालांकि, ऑडिट चोट करने में नाकाम रहे हैं। कारण है कि अमूमन ये कमी की बात करते हैं। इसके अलावा ब्‍यूरोक्रेसी को भी ऑडिट के पैरों को फाइलों में तब्‍दील करने की महारत हासिल हो गई है। इस तरह ये भी कुछ खास असर नहीं डालते हैं।

सुब्‍बाराव के मुताबिक, केंद्र और अलग-अलग राज्‍य जिस तरह लोन का मूल्‍य तय करते हैं, उस पर बाजार भी नियंत्रण लगा सकता है। लेकिन, वित्‍तीय दबाव के कारण केंद्र को मार्केट प्राइस से कम पर उधार मिल जाता है। इस तरह कोई सिग्‍नल नहीं मिल पाता है। राज्‍यों की भी जो साख होती है, वे भी उससे ज्‍यादा उधारी पा लेते हैं। इसके पीछे माना जाता है कि राज्‍यों को केंद्र का समर्थन है। हालांकि, असलियत में ऐसी कोई गारंटी नहीं होती है।

आरबीआई गवर्नर के अनुसार, चुनाव आयोग कैंपेन के दौरान रेवड़ि‍यों के वादों पर कंट्रोल कर सकता है। लेकिन, सरकार को वह नहीं रोक सकता है। किस तरह की रेवड़ी दी जाए और कितना कैसे खर्च हो, उसे लेकर अर्थशास्त्रियों का मत साफ है। वे कहते हैं कि इसे इस आधार पर होना चाहिए कि उसका असर कितना है। यह सिद्धांतों में है। लेकिन, इसे अमल में ला पाना मुश्किल है।

क्‍या है बुनियादी दिक्‍कत?
सुब्‍बाराव ने इसकी वजह बताई है। उन्‍होंने बताया कि वेलफेयर स्‍कीम के इकनॉमिक इम्‍पैक्‍ट का मूल्‍यांकन कर पाना आसान नहीं है। अगर इसका मूल्‍यांकन कर भी लिया जाए तो जमीन पर कौन सी स्‍कीम ज्‍यादा प्रभावी होगी, इसकी रैंकिंग करना मुश्किल होगा। इसका उदाहरण ले सकते हैं। मसलन, स्‍कूल की बच्चियों को साइकिल बांटने का फैसला ओल्‍ड एज पेंशन (AOP) के मुकाबले ज्‍यादा प्रभावी होगा। लेकिन, ऐसा कौन राजनेता है जो एओपी को खारिज करने के तर्क को न्‍यायोचित ठहरा पाएगा।

आखिर क्‍या है समाधान?
रेवड़‍ियों से बचने के लिए सुब्‍बाराव ने एक दूसरा रास्‍ता भी बताया है। उनके अनुसार, इसके लिए फिजूल के ट्रांसफर को परिभाषित करना होगा। इनमें रेवड़ी के तौर पर किसी वस्‍तु या सेवा को देना शामिल है। इस परिभाषा के तहत मनरेगा मजदूरी रेवड़ी नहीं होगी। लेकिन, टॉयलेट के लिए सब्सिडी, किसानों का कर्ज माफी या रियायती बस टिकट रेवड़ी मानी जाएगी।

केंद्र और राज्‍यों के लिए एफआरबीएम एक्‍ट में लिखा होना चाहिए कि वे ऐसी रेवड़‍ियों पर कितना खर्च कर सकते हैं। इसे सरकार के रेवेन्‍यू या जीडीपी/जीएसडीपी के प्रतिशत के अनुसार रखा जा सकता है। राजनेताओं के बीच प्रतिस्‍पर्धा होनी चाहिए कि कौन कितने सलीके से सीमित रकम को खर्च कर पाता है। इसमें बिना मेरिट वाली कुछ सब्‍स‍िडी भी आएंगी। लेकिन, उनके बारे में तब नहीं सोचना चाहिए।

सुब्‍बाराव कहते हैं कि लोकतंत्र में गैर-जिम्‍मेदाराना खर्च को चेक करने का जिम्‍मा लोगों का है। लेकिन, गरीब समाज में रेवड़ियो के लिए लोगों का वोट करना तर्कसंगत लगता है। इस समाज में नेताओं की साख बहुत नीची होती है। कम से कम इतना तो जरूर किया जा सकता है कि सभी राजनीतिक दलों के भीतर एक आदर्श आचार संहिता की शुरुआत की जाए।



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