Personal Data Protection: इंटरनेट पर किसी की मनॉपली नहीं चलेगी, जानिए कौन ऐसा बोल रहे हैं


Authored by Produced by शिशिर चौरसिया | नवभारत टाइम्स | Updated: Aug 4, 2022, 10:17 AM

केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (State Minister for Electronics & Information Technology) राजीव चंद्रशेखर के मुताबिक सरकार का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी प्लैटफॉर्म में इंटरनेट की खुली प्रकृति और चॉइस को खराब करने की ताकत न हो।

 

डिजिटल नागरिक के मौलिक अधिकार रहेंगे सुरक्षित (File Photo)

नई दिल्ली: भारत में पिछले कुछ दिनों से डेटा संरक्षण कानून (Personal Data Protection Bill) पर काफी चर्चा है। इस बीच डेटा की संप्रभुता और लोकलाइजेशन जैसे मुद्दे भी सामने आ रहे हैं। इनसे जुड़े अलग-अलग पहलुओं पर केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर से संजीव शंकरन ने बात की। पेश है इस बातचीत के मुख्य अंश:-

  1. डिजिटल फील्ड में कॉरपोरेशंस हावी है। इसके मद्देनजर इस फील्ड में संप्रभुता की जो कसरत हो रही है, उसकी खासियत क्या है?
    बिग टेक ने बमुश्किल 10-12 साल पहले ही इंटरनेट पर अपना वर्चस्व बनाया है। लेकिन अब इनका युग समाप्त हो रहा है। इंटरनेट आज एक नए मोड़ पर है। नए स्टार्ट-अप इसके महत्वपूर्ण प्लेयर हैं। हमें सुनिश्चित करना है कि इंटरनेट हमारे डिजिटल नागरिकों के लिए खुला, सुरक्षित, विश्वसनीय और जवाबदेह हो। डिजिटल स्पेस में डिजिटल नागरिकों के मौलिक अधिकार सुरक्षित रहें। मोदी सरकार यह सुनिश्चित करने के प्रयासों में लगी हुई है। इंटरनेट और साइबर स्पेस की कोई सीमा नहीं है। इसके लिए जरूरी कानून बनते रहेंगे।
  2. डिजिटल अर्थव्यवस्था डेटा के सहज प्रवाह पर चलती है। डेटा की वैल्यू चेन में बिग टेक सभी जगह हावी है। भारत सरकार की नीति कैसे नए खिलाड़ियों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करेगी?
    डेटा और डेटा फ्लो डिजिटल अर्थव्यवस्था और इनोवेशन इकोसिस्टम की लाइफलाइन हैं। 2016 से डिजिटल प्राइवेसी और डेटा प्रोटेक्शन भी भारतीय नागरिकों का मौलिक अधिकार है। इनोवेशन डिवेलपमेंट के साथ-साथ हमारे नागरिकों की सुरक्षा के लिए भी एक व्यापक ढांचा चाहिए। आज लगभग 80 करोड़ भारतीय इंटरनेट यूजर हैं, और अगले 2-3 वर्षों में यह संख्या 120 करोड़ होगी। एक राष्ट्रीय डेटा गवर्नेंस फ्रेमवर्क नीति का मसौदा तैयार किया जा रहा है। अधिक केंद्रीकृत डिजिटल डेटा प्राइवेसी कानून के साथ ही वह ढांचा बनेगा, जो डेटा/इनोवेशन अर्थव्यवस्था और डिजिटल प्राइवेसी की हमारी जरूरतें पूरी करेगा।
  3. UNCTAD का अनुमान है कि 2022 के आखिर तक दुनिया के चोटी के पांच टेक जाएंट्स की विज्ञापनों में हिस्सेदारी 70 प्रतिशत हो जाएगी। राजस्व के ऐसे केंद्रीकरण से क्या लोकतंत्र कमजोर नहीं होगा?
    इंटरनेट के लिए मोदी सरकार जो नीतियां बना रही है, उनमें एक खुलापन है। यह बाजार के प्रभुत्व के विपरीत है। हमारा लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी प्लैटफॉर्म में इंटरनेट की खुली प्रकृति और चॉइस को खराब करने की ताकत न हो। इंटरनेट पर शक्ति के केंद्रीकरण के कई मुद्दे हैं। कुछ बिग टेक प्लैटफार्मों का डिजिटल विज्ञापन और विज्ञापन-तकनीकी पर प्रभुत्व भी एक मुद्दा है। इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
  4. यूरोपीय संघ, चीन और रूस ने डिजिटल संप्रभुता के लिए अपना-अपना तरीका अपनाया है। भारत के लिए सबसे अच्छा तरीका क्या है?
    लोगों के जीवन और अवसरों को बेहतर बनाने के लिए तकनीक के उपयोग में भारत दुनिया में प्रमुखता से उभरा है। कई मायनों में हम दुनिया के लोकतंत्रों के लिए एक प्रकाशस्तंभ हैं। पिछले सात वर्षों की सफलताओं के साथ ही हम इंटरनेट के भविष्य को आकार देने में बाकी लोकतंत्रों के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। भारतीय मॉडल कभी भी चीन या रूस जैसा बंद नहीं होगा। हमारे प्रधानमंत्री की दृष्टि यह सुनिश्चित करती है कि हमारा इंटरनेट हमारे लोकतांत्रिक और खुले मूल्यों को दर्शाएगा। इसलिए OSTA की शर्तें हमेशा हमारे नागरिकों और स्टार्टअप के अधिकारों की ऑनलाइन रक्षा करेंगी।
  5. डिजिटल संप्रभुता एक दोधारी तलवार है क्योंकि इससे राज्य की शक्ति के दुरुपयोग की भी आशंका रहती है। इस मुद्दे पर आपका क्या कहना है?
    हमारे यहां नियम-कानून अपने लक्ष्यों और उद्देश्यों में पारदर्शिता के साथ बनाए जाते हैं। जहां भी सरकार के पास जनहित में हस्तक्षेप करने की शक्तियां हैं, वहां उचित प्रक्रिया, सुरक्षा उपायों और जिम्मेदारी के साथ उनका उपयोग किया जाता रहेगा। डेटा डोमेन में सरकार के अधिकार निजी क्षेत्र की कंपनियों से बहुत अलग होंगे, क्योंकि सरकार और शासन के बहुत अलग लक्ष्य हैं। इसके अलावा, भारत में कानून का शासन है। जब ऐसे कानून या नियम बनाए जाते हैं जो अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, तो विदेशी कंपनियों सहित सभी के पास अदालत जाकर उसकी न्यायिक समीक्षा करवाने का अधिकार होता है।

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